‘आदिवासी समाज हमारे धर्म का मूल’, रांची में जनजातीय संवाद में बोले संघ प्रमुख मोहन भागवत


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत शनिवार (24 जनवरी, 2026) को झारखंड की राजधानी रांची पहुंचे, जहां उन्होंने आदिवासी समुदाय के लोगों के साथ सीधी बातचीत की. इस दौरान उन्होंने कहा कि जिन्हें आज आदिवासी कहा जाता है, वही हमारे धर्म के मूल हैं.

मोहन भागवत ने कहा कि विविधता में विद्यमान एकता हमारे पूर्वजों में निहित है. पूजा के अनगिनत रूप हो सकते हैं और प्रत्येक आदर के योग्य है. सभी प्रकार की पूजा को स्वीकार करें और उनका सम्मान करें, यह मानते हुए कि वे सभी वैध हैं. अपनी पद्धति से पूजा करें. दूसरों की पूजा के तरीकों का भी सम्मान करें, उन्हें स्वीकार करें और सद्भाव में एक साथ आगे बढ़ें. यही हमारे देश का स्वाभाविक सार है. आपको यह जानना चाहिए कि धर्म का सार प्रकृति के साथ जुड़ा हुआ है.

हमारे देश में एक पूजा कब थी?- भागवत

रांची के कार्निवल बैंक्वेट हॉल में आयोजित कार्यक्रम में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, ‘पहले हमारे पूर्वज जंगलों और आश्रमों में रहते थे. खेती करते थे और जंगल के आधार पर जीते थे. उस समय उनको जो अनुभूति हुई, वही उपनिषद है. आदिवासी उनके विचारों से चलते हैं. अब कुछ लोग कहते हैं कि ये लोग हिंदू नहीं हैं, क्योंकि इनकी पूजा अलग है, तो हमारे देश में एक पूजा कब थी?’

उन्होंने कहा, ‘सबसे पुराने वेदों में लिखा है और वेदों में एक अर्थ है: अनेक भाषा बोलने वाले और अनेक धर्मों को मानने वाले लोग पृथ्वी माता पर रहते हैं. जैसे गाय अनेक धाराओं से सबको दूध देती है, वैसे ही इनको आश्रय प्रदान करो.’

जिस एकता से हमने शुरुआत की थी, वह आज तक कायम- भागवत

इसके साथ, मोहन भागवत ने कहा, ‘इस लंबे समय में कई विकास हुए हैं और स्वाभाविक रूप से समय के साथ-साथ विचार और संस्कृति के उच्च स्तर विकसित हुए हैं. फिर भी, जिस एकता से हमने शुरुआत की थी, वह आज तक कायम है. यही हमारा इतिहास है. जिसे हम अब हिंदू या हिंदू धर्म कहते हैं, उसकी शुरुआत कैसे हुई? हिंदू नाम बहुत बाद में आया और धर्म की अवधारणा समय के साथ विकसित हुई. यदि हम सनातन धर्म की उत्पत्ति का पता लगाने का प्रयास करें, तो हम पाते हैं कि इसकी जड़ें हमारे देश के जंगलों और कृषि पद्धतियों में निहित हैं.’

उन्होंने कहा, ‘इसका मतलब यह हुआ कि जिन्हें आज आदिवासी कहा जाता है, वही हमारे धर्म के मूल हैं. वेदों का मूल खोजने के लिए जाएं तो वहीं जाना पड़ेगा. आज के आदिवासी समाज का कोई धर्म नहीं है, यह गलत बात है. धर्म का अर्थ है कि पूजा करो, तो पूजा पहले से चली आ रही है. पूजा के पीछे का विचार भी तभी से चला आ रहा है. उसका अनुसंधान करेंगे तो ये सब उपनिषदों से मिलने वाला है.’

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