V2V Tech Mandatory in Cars by 2026; Price Hike Expected


नई दिल्ली11 दिन पहले

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अब गाड़ियां करीब आते ही खुद एक-दूसरे को अलर्ट करेंगी। इसके लिए केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने घोषणा की है कि सरकार साल 2026 के अंत तक देश में ‘व्हीकल-टू-व्हीकल’ (V2V) कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी को अनिवार्य करने की प्लानिंग कर रही है।

इस तकनीक की मदद से गाड़ियां सड़क पर चलते हुए एक-दूसरे को सेफ्टी अलर्ट भेज सकेंगी, जिससे टक्कर और हादसों को रोका जा सकेगा। यह फैसला 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के परिवहन मंत्रियों की बैठक के बाद लिया गया है। सरकार का टारगेट 2030 तक सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों को 50% तक कम करना है।

कैसे काम करेगी तकनीक: पायलट की तरह बात करेंगे ड्राइवर्स

नितिन गडकरी ने इस सिस्टम को समझाते हुए बताया कि इसके लागू होने के बाद गाड़ियां आपस में वैसे ही बात कर सकेंगी, जैसे आसमान में पायलट करते हैं। हर गाड़ी में एक ‘ऑन-बोर्ड यूनिट’ (OBU) फिट की जाएगी। यह यूनिट आसपास की दूसरी गाड़ियों को अपनी लोकेशन, स्पीड, डायरेक्शन और ब्रेक लगाने जैसी जानकारी वायरलेस टेक्नोलॉजी के जरिए भेजेंगी। इससे ड्राइवर को खतरा दिखने से पहले ही अलर्ट मिल जाएगा।

कोहरे और अंधे मोड़ पर भी मिलेगा अलर्ट

V2V टेक्नोलॉजी उन हालात में सबसे ज्यादा कारगर होगी, जहां कैमरा या रडार काम नहीं कर पाते।

  • कोहरा और धुंध: विजिबिलिटी कम होने पर भी पीछे वाली गाड़ी को पता चल जाएगा कि आगे वाली गाड़ी ने अचानक ब्रेक लगाए हैं।
  • ब्लाइंड स्पॉट: अंधे मोड़ या इंटरसेक्शन पर सामने से आ रही गाड़ी का सिग्नल पहले ही मिल जाएगा।
  • रुकी हुई गाड़ियां: अगर सड़क पर आगे कोई गाड़ी खराब खड़ी है तो दूर से ही ड्राइवर को उसका अलर्ट मिल जाएगा।

5 से 7 हजार रुपए तक महंगी हो सकती हैं गाड़ियां

सरकार इस पूरे प्रोग्राम पर करीब 5,000 करोड़ रुपए खर्च कर सकती है। हालांकि, गाड़ियों में लगने वाली ऑन-बोर्ड यूनिट (OBU) की कीमत 5,000 से 7,000 रुपए के बीच होने का अनुमान है।

शुरुआत में इसे नई कारों, बसों और ट्रकों के लिए अनिवार्य किया जा सकता है। बाद में पुरानी गाड़ियों में भी इसे अलग से लगवाने का नियम आ सकता है। जानकारों का मानना है कि इससे गाड़ियों की कीमतें बढ़ सकती हैं।

स्पेक्ट्रम के लिए दूरसंचार विभाग से समझौता

V2V सिस्टम को चलाने के लिए खास फ्रीक्वेंसी की जरूरत होती है। गडकरी ने बताया कि दूरसंचार विभाग (DoT) के साथ एक जॉइंट टास्क फोर्स बनाई गई है। विभाग 5.875-5.905GHz बैंड में 30MHz स्पेक्ट्रम अलॉट करने के लिए सैद्धांतिक रूप से सहमत हो गया है। सड़क परिवहन सचिव वी. उमाशंकर के मुताबिक, ऑटो कंपनियों के साथ तकनीकी मानकों (Technical Standards) को अंतिम रूप दिया जा रहा है।

चुनौती: 2026 के अंत तक लागू करना कितना मुमकिन?

भले ही सरकार ने 2026 की समयसीमा तय की है, लेकिन यह लक्ष्य काफी चुनौतीपूर्ण है।

  • ग्लोबल स्टेटस: अमेरिका, यूरोप और जापान जैसे देशों ने सालों पहले इसके लिए स्पेक्ट्रम दिया था, लेकिन वहां भी यह अभी तक पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है।
  • कंपनियों की तैयारी: कार कंपनियों को सभी मॉडल्स में इस हार्डवेयर को फिट करने, टेस्टिंग और ब्रांड्स के बीच तालमेल बैठाने के लिए वक्त चाहिए होगा।

ADAS और V2V में क्या अंतर है?

आजकल कई कारों में ADAS (एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम) आता है, जो कैमरा और सेंसर पर निर्भर है। यह सिर्फ वही देख सकता है जो कैमरे के सामने है। वहीं V2V तकनीक वायरलेस सिग्नल पर काम करती है। यानी अगर आपके आगे एक बड़ा ट्रक चल रहा है और उसके आगे कोई खतरा है, तो ADAS उसे नहीं देख पाएगा, लेकिन V2V के जरिए आगे वाली गाड़ी का सिग्नल ट्रक के पार आपकी कार तक पहुंच जाएगा।

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